Madhuraj Kumar

Rookie - 320 Points (Bagaha, Bihar)

Best Poem of Madhuraj Kumar

फिर से..

क्या ऐसा होगा कि

वह एक दिन आएगा

जब सारी दुनिया पर

कालिख पोंत दी जाएगी

अँधेरे की,

मैं पूछूँगा खुद से उसदिन

क्या फिर ऐसा होगा कि

कहीं दबा कुचला सूरज

अपनी अंतिम साँसें गिनता हुआ

बची खुची रौशनी की किरणें

बिखेर जाएगा

फिर से,

मैं पूछूँगा खुद से उसदिन

क्या फिर ऐसा होगा

कि वक़्त की घड़ियाँ

उल्टी चलने लगेंगी

और दुनियाभर के शूरवीरों की

तलवारें सीधी,

मैं पूछूँगा खुद से उसदिन

क्या फिर ऐसा होगा

कि शक्ति की कोई मूरत

बेहद बर्बरता से ...

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तुम्हें ही...

तुम्हें ही
दूर आसमाँ के साये में इक चेहरा उभरते देखा है
हवा की थिरकन में इक जादू तिरते देखा है
फूलों में कलियों में किसी को महकते देखा है
सूर्य की अग्नि बन कर किसी को दहकते देखा है
आसमाँ में चाँद को किसी से शर्माते देखा है
इन काली घटाओ में उन जुल्फो को लहराते
देखा है
इन जल लहरों के अंतर में इक मस्ती उमड़ते

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