Kumar Mohit


जब अधनिकले से दांतो वाला - Poem by Kumar Mohit

हृदयाघात से ज्यादा गहरी, चोट दिल को पहुंचता है;
जब अधनिकले से दांतो वाला, बच्चा प्रशन दोहराता है;

मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक, जो चाहूँ कर सकता हूँ;
तुम होते कौन हो कहनेवाले, जैसे चाहूँ रह सकता हूँ;
जब देखो तब कहते रहते, ये नहीं करना, वो नहीं करना;
यँहा ना जाना, वँहा ना जाना,
ये ना खाना, वो ना खाना;
चाहते क्या हो, ये तो बता दो;
क्यों व्यर्थ समस्या पैदा करते?
जब लालन-पालन कर ना सको तो;
क्यूँ व्यर्थ में बच्चे पैदा करते?
बिन कुछ सोचे, बिन कुछ जाने,
मात-पिता पर, बच्चा उंगली उठाता है;
हृदयाघात से ज्यादा ………

अरे समझता क्यों नहीं मूरख,
हमसे तू अलग नहीं ठहरा;
दंभ भर रहा जिस पर इतना,
हमसे मिला तुझे वो चेहरा;
जिस शरीर का ध्यान तू रखता,
है हिस्सा वो हम दोनों का;
और अभिन्न अंग कहलाता है,
पिता का पौरुष, माँ कि ममता,
और भगवान कि माया;
इन तीनों पर प्रश्न उठाकर,
इतना दुःख पहुंचाता है;
जब अधनिकले दांतो वाला ……………………


Comments about जब अधनिकले से दांतो वाला by Kumar Mohit

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Saturday, May 3, 2014



[Hata Bildir]