Madhuraj Kumar

Rookie - 320 Points (Bagaha, Bihar)

वही पुरानी धुन - Poem by Madhuraj Kumar

दिल के बंद दरवाज़े पर
है ये किसका जोर
दिल का पंछी फँस गया
क्या जाने किस ओर

हौले हौले दबे पाँव
किसकी है ये आहट
जैसे जवां हो रही
नई नवेली चाहत

संवेदनाओं के पन्नों पर
छाई नई उमंग
नभ से ऊँची उड़ रही
मेरे सपनों की पतंग

मौसम ने अचानक क्यों
ऐसी ली अंगड़ाई
सारी बातें भूल कर
बह चली पुरवाई

दिन के पत्ते झर गए
हुई सुहानी शाम
मानो कि बढ़ गए हों
रौशनी के ज्यों दाम

लो चंदा भी आ गया
मेरे तराने सुन
दिल ने फिर से छेड़ दी
वही पुरानी धुन

कितनी प्यारी लंबी बातें
कैसे वो अहसास
कबसे अकेला बैठा हूँ
तेरी यादों के पास

ना तो मै यूँ रूसवा हूँ
ना ही है तनहाई
मेरे दिल के हर कोने में
बस तेरी परछाई

मेरी आँखों में खुशियों के
छलके ज्यों दो जाम
भीगे सपनों की चादर में
मै और तुम्हारा नाम

यादों के आकाश में
उड़ूं मैं पंख पसार
इतनी सी है दुनिया मेरी
बस इतना संसार।

Topic(s) of this poem: Love


Comments about वही पुरानी धुन by Madhuraj Kumar

  • (2/25/2016 12:27:00 PM)


    Bhut pyari kavita hai........ Khub sara pyar k sath :) (Report) Reply

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Poem Submitted: Monday, April 28, 2014

Poem Edited: Thursday, July 3, 2014


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