Sandhya Jane


कर्म ही अब धर्म जहाँ... - Poem by Sandhya Jane

ये मेरे देश के नये सांसदों,
ज़रा सुनो देशवासियों के दिलोंकों;
नया दिन और नई शुरवात लेकर,
आयी है माथे की ये नयी लकीर;
लोकीन याद रहे वो मंझिल और ये लक्ष,
क्योंकि हर देश वासी है इसी के पक्ष...

इसमें है....
कोटीयों की आशा, लाखों का पसीना,
हज़ारों की ये लड़ाई में कुछ सैकड़ों का जीतना;
बहुत मुश्किल था ये रणसंग्राम,
लोकीन सब मिलके बना दिया ये आसान...

अब ज़रा ध्यान दे यहाँ - कर्म ही अब धर्म जहाँ...
न कभी सुस्त होना, न होना कभी मदहोश,
न बेईमान होना, न बनना अहसान फ़रामोश;
क्योंकि हर दिन की तो श्याम होनी है,
और हर कर्म को इतिहास में जगह मिलनी है...


Poet's Notes about The Poem

This poem inspired after recent general election.

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Poem Submitted: Thursday, July 24, 2014



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