hasmukh amathalal

Gold Star - 44,856 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

अपने आपही रास्ता नापो apne aap hi - Poem by hasmukh amathalal

अपने आपही रास्ता नापो

संत और महाज्ञानी
करते है अपनी मनमानी
जनता रहती है सदा भोलीभाली
प्रभु ये कैसी माया रचा डाली?

वो कहते है इलाज सिर्फ नीता कर सकती है
ऐसे लोग हमेशा जग जीता करते है
बुद्धू बनाकर जनता को अपना उल्लू सीधा करते है
अपना जीवन तो ठीक दुसरे धर्मो को भी निशाना बना रहे है

'अरे तूने आज क्या खाया'? संतजी ने पूछा
'कुछ नहीं प्रभु सिर्फ समोसा खाया' भक्त ने अपना सर पोंछा
फिर बाँट ले समोसे अपनी शेरी के बीच
अपनी डोर अपने आप ही खींच

एसे संतो ने अपना डेरा जमा रखा है
पूंजी भी खासी और अपने को खेरखां समज रखा है
नारी विशेष टिप्पणी करते उन्हें लाज शर्म नहीं आती
अरे अपनी बेटी सरीखी कन्या को छेड़खानी करनी भाती

भक्तो करो अब पुकार 'एसे पाखंडियों की अब कोई जगह नहीं'
जहाँ भी मिल जाय अब उनकी खेर नहीं
शामत अब आही गयी है जनता भी जाग चुकी है
संत महाराज को जेल की हवा भी भा चुकी है

खूब बुध्धू बनाया और बेवकूफ
अब न रहेगी सजा मौकूफ
दिलफेंक संतो जागो
अपने आपही रास्ता नापो

कही आप बेइज्जत न हो जाय
जनता का गुस्सा पता नहीं किस कदर बढ़ जाय
सब मील कर आपके कपडे उतारे
इसके पहले सोच लो और गिन लो तारे


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Poem Submitted: Friday, September 20, 2013



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