(7 July 1934 / Chakia, Ballia, Uttar Pradesh / India)

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मंच और मचान

पनों की तरह बोलते
तने की तरह चुप
एक ठिंगने से चीनी भिक्खु थे वे
जिन्हें उस जनपद के लोग कहते थे
चीना बाबा

कब आये थे रामाभार स्तूप पर
यह कोई नहीं जानता था
पर जानना जरूरी भी नहीं था
उनके लिये तो बस इतना ही बहुत था
कि वहाँ स्तूप पर खड़ा है
चिड़ियों से जगरमगर एक युवा बरगद
बरगद पर मचान है
और मचान पर रहते हैं वे
जाने कितने समय से

अगर भूलता नहीं तो यह पिछली सदी के
पाँचवे दशक का कोई एक दिन था
जब सड़क की ओर से भोंपू की आवाज़ आई
भाइयो और बहनो,
प्रधानमंत्री आ रहे हैं स्तूप को देखने...

प्रधानमंत्री!
खिल गए लोग
जैसे कुछ मिल गया हो सुबह-सुबह
पर कैसी विडम्बना
कि वे जो लोग थे
सिर्फ़ नेहरू को जानते थे
प्रधानमंत्री को नहीं!

सो इस शब्द के अर्थ तक पहुँचने में
उन्हें काफ़ी दिक़्क़त हुई
फिर भी सुर्ती मलते और बोलते-बतियाते
पहुँच ही गये वे वहाँ तक
कहाँ तक?
यह कहना मुश्किल है

कहते हैं प्रधानमंत्री आये
उन्होंने चारों ओर घूम कर देखा स्तूप को
फिर देखा बरगद को
जो खड़ा था स्तूप पर

पर न जाने क्यों
वे हो गये उदास
और कहते हैं नेहरू अक्सर
उदास हो जाते थे
फिर जाते-जाते एक अधिकारी को
पास बुलाया
कहा देखो उस बरगद को गौर से देखो
उसके बोझ से टूट कर
गिर सकता है स्तूप
इसलिये हुक्म है कि देशहित में
काट डालो बरगद
और बचा लो स्तूप को

यह राष्ट्र के भव्यतम मंच का आदेश था
जाने-अनजाने एक मचान के विरुद्ध
इस तरह उस दिन एक अद्भुत घटना घटी
भारत के इतिहास में
कि मंच और मचान
यानी एक ही शब्द के लम्बे इतिहास के
दोनों ओर-छोर
अचानक आ गये आमने-सामने

अगले दिन
सूर्य के घंटे की पहली चोट के साथ
स्तूप पर आ गए
बढ़ई
मजूर
इंजीनियर
कारीगर
आ गए लोग दूर-दूर से

इधर अधिकारी परेशान
क्योंकि उन्हें पता था
खाली नहीं है बरगद
कि उस पर एक मचान है
और मचान भी खाली नहीं
क्योंकि उस पर रहता है एक आदमी
और खाली नहीं आदमी भी
क्योंकि वह ज़िन्दा है
और बोल सकता है

क्या किया जाए?
हुक्म दिल्ली का
और समस्या जटिल
देर तक खड़े-खड़े सोचते रहे वे
कि सहसा किसी एक ने
हाथ उठा प्रार्थना की
चीना बाबा,
ओ...ओ... चीना बाबा!
नीचे उतर आओ
बरगद काटा जायेगा
काटा जायेगा?
क्यों? लेकिन क्यों?
जैसे पनों से फूट कर जड़ों की आवाज़ आई

पर का आदेश है
नीचे से उतर गया

तो शुनो भिक्खु अपनी चीनी गमक वाली
हिन्दी में बोला
चाये काट डालो मुझी को
उतरूंगा नईं
ये मेरा घर है!

भिक्खु की आवाज़ में
बरगद के पनों के दूध का बल था

अब अधिकारियों के सामने
एक विकट सवाल था एकदम अभूतपूर्व
पेड़ है कि घर
यह एक ऐसा सवाल था
जिस पर कानून चुप था
इस पर तो कविता भी चुप हैं
एक कविता प्रेमी अधिकारी ने
धीरे से टिप्पणी की

देर तक
दूर तक जब कुछ नहीं सूझा
तो अधिकारियों ने राज्य के उच्चतम
अधिकारी से सम्पर्क किया
और गहन छानबीन के बाद पाया गया
मामला भिक्खु के चीवर-सा
बरगद की लम्बी बरोहों से उलझ गया है
हार कर पाछ कर अंततः तय हुआ
दिल्ली से पूछा जाय

और कहते हैं
दिल्ली को कुछ भी याद नहीं था
न हुक्म
न बरगद
न दिन
न तारीख़
कुछ भी कुछ भी याद ही नहीं था

पर जब परत दर परत
इधर से बतायी गयी स्थिति की गम्भीरता
और उधर लगा कि अब भिक्खु का घर
यानी वह युवा बरगद
कुल्हाड़े की धार से बस कुछ मिनट दूर है
तो ख़याल है कि दिल्ली ने जल्दी-जल्दी
दूत के जरिये बीजिंग से बात की
इस हल्की सी उम्मीद में कि शायद
कोई रास्ता निकल आए
एक कयास यह भी
कि बात शायद माओ की मेज़ तक गई

अब यह कितना सही है
कितना ग़लत
साक्ष्य नहीं कोई कि जाँच सकूँ इसे
पर मेरा मन कहता है काश यह सच हो
कि उस दिन
विश्व में पहली बार दो राष्ट्रों ने
एक पेड़ के बारे में बातचीत की

तो पाठकगण
यह रहा एक धुंधला सा प्रिण्ट आउट
उन लोगों की स्मृति का
जिन्हें मैंने खो दिया था बरसों पहले

और छपते-छपते इतना और
कि हुक्म की तामील तो होनी ही थी
सो जैसे-तैसे पुलिस के द्वारा
बरगद से नीचे उतारा गया भिक्खु को
और हाथ उठाए मानो पूरे ब्रह्मांड में
चिल्लाता रहा वह
घर है...ये...ये....मेरा घर है

पर जो भी हो
अब मौके पर मौजूद टांगों कुल्हाड़ों का
रास्ता साफ था
एक हल्का सा इशारा और ठक्‌...ठक्‌
गिरने लगे वे बरगद की जड़ पर
पहली चोट के बाद ऐसा लगा
जैसे लोहे ने झुक कर
पेड़ से कहा हो- माफ़ करना भाई,
कुछ हुक्म ही ऐसा है
और ठक्‌ ठक्‌ गिरने लगा उसी तरह
उधर फैलती जा रही थी हवा में
युवा बरगद के कटने की एक कच्ची गंध
और नहीं...नहीं...
कहीं से विरोध में आती थी एक बुढ़िया की आवाज़
और अगली ठक्‌ के नीचे दब जाती थी
जाने कितनी चहचह
कितने पर
कितनी गाथाएँ
कितने जातक
दब जाते थे हर ठक्‌ के नीचे
चलता रहा वह विकट संगीत
जाने कितनी देर तक

कि अचानक
जड़ों के भीतर एक कड़क-सी हुई
और लोगों ने देखा कि चीख़ न पुकार
बस झूमता-झामता एक शाहाना अंदाज़ में
अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद
सिर्फ 'घर' वह शब्द
देर तक उसी तरह
टंगा रहा हवा में

तब से कितना समय बीता
मैंने कितने शहर नापे
कितने घर बदले
और हैरान हूँ मुझे लग गया इतना समय
इस सच तक पहुँचने में
कि उस तरह देखो
तो हुक़्म कोई नहीं
पर घर जहाँ भी है
उसी तरह टंगा है

Submitted: Thursday, July 05, 2012


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