hasmukh amathalal

Gold Star - 35,580 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

पियु मारो गयो परदेस..piyu maro gayo - Poem by hasmukh amathalal

पियु मारो गयो परदेस

पियु मारो गयो परदेस
जियो ना लागे मारो इस देस
तडपु में बिन थारे इस वेश में
पड गयी हु दिल से पशोपेश में

घर में न लगे दिल ना बहार में
सब से उब गयी इस करारी हार में
न कभी सोचा था मिलेगी ऐसी विरानियाँ
कोस रही होगी मेहलोकी भी महारानोयाँ

काले काले बादल आसमान में गरज रहे है
विनती मेरी और अरज सुन भी रहे है
बिजली का काम है मुझको डराना
गम को बढ़ाना और दिल को गभराना

मे संवर भी रही हु और खुश भी हूँ
दिलकी बात किसको बताती भी हु
मुझे नाराजगी इस बात की नहीं है
राणाजी मेरे से दूर है यह भी तो हकीकत है

चल हवा धीरे से तू बहक ले
भीनी भीनी खुश्बू से हलकी महक ले
बिन बरसात गमो की बोछार
में मनाउ उसे जैसे लगे त्यौहार

राणाजी कब आओगे वापस अपने देस?
मै तो मरी मरी जाउंगी देखकर आपका भेस
कानाजी मुरली से मैंने क्या लेना?
आप से बस सुनना है रागनी का गाना

लगता नहीं दिल अब कई कई दिनॊ से
आप जो दूर रहे हो जोजन और मिलोसे
मैंने भी सफ़र कर ही लिया अपने मन की दृष्टि से
कैसी सुहानी रही आपकी याद इस सृष्टि से

में आत्म विभोर हो गयी
जब सुनी काली काली भाषा किशोर से
खो गयी सपनो की दुनिया मे इस कदर
जैसे टुकड़ा मिल गया हो छेदकर जिगर


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Poem Submitted: Wednesday, July 24, 2013

Poem Edited: Wednesday, July 24, 2013


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