Vidyapati Thakur

(1352 - 1448 / Bishphi / Bihar, India)

सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ - Poem by Vidyapati Thakur

सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ !
रोपि पेम बिज अंकुर मूड़ल बांढब कओने उपाइ !१!

तेल-बिन्दु दस पानि पसारिअ ऐरान तोर अनुराग !
सिकता जल जस छनहि सुखायल ऐसन तोर सोहाग !२!

कुल-कामिली छलौं कुलटा भय गेलौं तनिकर बचन लोभाइ !
अपेनहि करें हमें मूंड मूडाओल कान्ह सेआ पेम बढ़ाइ !३!

चोर रमनि जनि मने-मने रोइअ अम्बर बदन भपाइ !
दीपक लोभ सलभ जनि घायल से फल पाओल घाइ !४!

भनइ विद्यापति ई कलयुग रिति चिन्ता करइ न कोई !
अपन करम-दोष आपहि भोगइ जो जनमान्तर होइ !५!


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Poem Submitted: Tuesday, May 1, 2012



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