Kumar Mohit


जो तूने ना trace किया - Poem by Kumar Mohit

टुकड़ों में खुद को पेश किया, नाम तेरे यह वेष किया;
फिर ना जाने क्या छूट गया, जो तूने ना trace किया;

प्रथम वर्ष में इस college के, मिला था मुझको golden chance;
freshers वाली रात में उसको, पहली बार किया था glance;
search अभियान हुआ शुरू फिर, नाम branch सब पता किया;
दो - तीन दिन में class में उसकी, जासूसों को नियुक्त किया;
प्रभु दया से सारा system, दो -तीन महिने सही चला;
कभी lab, तो कभी class के बाहर उसको खड़ा मिला;
eye contact बहुत हो गया, अब कुछ solid करना था;
front of her, friendship को अपनी, अब promote तो करना था;
library में मिली अकेली, मैंने कहा जी दोस्ती करलो;
रुखा सा reply आया,
नहीं जानती हुँ मैं तुमको, और तुम कहते दोस्ती करलो;
अब मुशकिल लग रहा था मुझको, प्रेम प्रसंग का extension;
बार -बार ignorance उसका, दिला रहा hypertension;
कितने पापड़ बेले मैंने, एक साल होने को आया;
इधर -उधर से search-वर्च कर, मैंने उसका नंबर पाया;
नंबर मिला तो b'day आया,
mid-term की तैयारी छोड़, उसके लिए gift बनाया;
जाने किस मिटटी कि थी वो, यह भी उसको रास ना आया;
उससे friendship करने खातिर,
उसकी class के हर बच्चे को मैंने अपना दोस्त बनाया;
उसकी एक झलक कि खातिर,
2nd sem के हर paper को, ढाई घंटे में छोड़ के आया;
तीन साल हो गए हैं देखो, अब भी हालत वही रही;
वर्षों पहले भेजी request, आज भी accept नहीं हुई;

तेरे खातिर career अपना खुद हाथों से crash किया;
फिर न जाने क्या छूट गया, जो तूने ना trace किया;


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Poem Submitted: Saturday, May 3, 2014



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