Tarun Upadhyay


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Best Poem of Tarun Upadhyay

मैं स्त्री हूँ

मैं स्त्री हूँ
रत्नगर्भा, धारिणी
पालक हूँ, पोषक हूँ
अन्नपूणा,
रम्भा, कमला, मोहिनी स्वरूपा
रिद्धि- सिद्धि भी मैं ही,
शक्ति स्वरूपा, दुर्गा काली, महाकाली,
महिषासुरमर्दिनी भी मैं ही
मैं पुष्ट कर सकती हूँ जीवन
तो नष्ट भी कर सकती हूँ,
धरती और उसकी सहनशीलता भी मैं
आकाश और उसका नाद भी मैं
आज तक कोई भी यज्ञ
पूर्ण नहीं हो सका मेरे बगैर,
फिर भी
पुरुष के अहंकार ने, उसके दंभ, उसकी ताकत ने,
मेरी गरिमा को छलनी किया हमेशा ही
मजबूर किया अग्नि -परीक्षा देने को, कभी किया चीर-हरण...
उस खंडित गरिमा के घावों की मरहम -पट्टी न कर ...

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