KAVIKUMAR SUMIT


वृद्धजन खुली किताब हैं

वृद्धजन खुली किताब हैं

हाँथ में लाठी मन में आशिष
निर्भय पौधों को सींचें ख्वाब हैं
समसामयिक इतिहास की बारिस
वृद्ध जन खुली किताब हैं

तर्क-वितर्क भेद न रंजिश
सब दुर्गुण के दाब हैं

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