Mukul Kumawat


गुरु-समीक्षा

गुरु से बढ़कर इस दुनिया में, न कोई दूजा होवे रे
जो गुरु को कुछ भी न समझे, वो रावण बन रोवे रे

प्रेम-क्रोध तो दो ही रूप है, दया-दृष्टि की महिमा अनूप है
मात-पिता है प्रेम के सागर, गुरु तो शिक्षा का स्तूप है

सत व कुमार्ग को दर्शाते, स्वयं की महिमा कभी न बतलाते
मार्ग भटकने पर समझाते, वही तो असल गुरु कहलाते

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