Yashovardhan Kulkarni


चलो आज चल सकनेवाला आदमी, आजकी शख्सियत तैयार करो - aaj ka aadmi taiyyar karo - Poem by Yashovardhan Kulkarni

चलो आज का आदमी, आजकी शख्सियत तैयार करो
जो सेह सके कहके की its cool,
जिस के ज़ेहन पे तटस्थता की परिभाषा छपी हुयी हो

रास्ते को दुत्कार से बुला सको,
खिले फूलों को छलनी करने की तैयारी हो,
अपने जी को खुले आम सुराही का रास्ता दिखा सको,
कायदे से बेचीं ज़मीन को झुंजलाता दिखा सको


बिस्मिल को जुबान न कहो,
जज्बातों को जाँ न कहो,
दिल को प्यार न कहो,
पहले प्यार को रबाब न कहो

अरे समझ ले भैया यहाँ गर चलने की ख्वाहिश रखता है तो इस ज़िकर को अपना ले,
वरना ये दुनिया रूह खा जाएगी

रब को याद करने वाले बड़े बूढ़ों को जुबानी सुना सको,
जली-भूनी ज़िन्दगी को बचकानी सीखा सको,
ठण्ड में कापते बच्चे को उसका काम याद दिला सको

Topic(s) of this poem: indifference


Comments about चलो आज चल सकनेवाला आदमी, आजकी शख्सियत तैयार करो - aaj ka aadmi taiyyar karo by Yashovardhan Kulkarni

  • Rajnish Manga (3/21/2015 10:18:00 PM)


    प्रशंसा के काबिल. वर्तमान समय की सच्चाई से रू-ब-रू करवाती है आपकी यह कविता. अच्छा कटाक्ष है. धन्यवाद, मित्र. (Report) Reply

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Poem Submitted: Saturday, March 21, 2015

Poem Edited: Saturday, March 28, 2015


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