Yashovardhan Kulkarni


जल जाता है धुआँ भी यहाँ - Jal Jata Hai Dhuaan Bhi Yahan - Poem by Yashovardhan Kulkarni

जल जाता है धुआँ भी यहाँ
किसीकी हो न सकेगी यह फिज़ा
जल जाता है
जल जाता है

एक शूर अपने हाथों को आझामाने आता है कभी यहाँ
धुप के कोहनी में पर बह जाता है
बह जाता है
बह जाता है

रेत की डालियाँ बनी हैं यहाँ
इनपे घर बनाने के वायदे भी बेचे जाते हैं यहाँ
पर
बिखर जाते हैं
बिखर जाते हैं

तेरे मेरे बचपन में बुनती है सदाएं यहाँ
और बस अविश्वास को सच मानके जीई जाती हैं सासें यहाँ
प्रत्यय की आवाजें लेकिन
खो जाती है
खो जाती हैं

दुरसे दूरवालों का अनुमान लगता हैं यहाँ
और बची को बेभाक कहके लगती है बोली यहाँ
किसकी हो खबर फिर, किसकी हो खबर फिर
भाप बन
उड़ जाती है
उड़ जाती है

Topic(s) of this poem: love and life


Comments about जल जाता है धुआँ भी यहाँ - Jal Jata Hai Dhuaan Bhi Yahan by Yashovardhan Kulkarni

  • Rajnish Manga (8/27/2015 11:10:00 PM)


    बिलकुल नए अंदाज़ में कही गई आपकी यह कविता दिल को छू जाती है. निम्न पंक्तियाँ विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं. धन्यवाद. (Report) Reply

    (8/29/2015 4:24:00 PM)

    धन्यवाद

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Poem Submitted: Thursday, August 27, 2015

Poem Edited: Thursday, August 27, 2015


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