sanjay kumar maurya

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Kyu, N Zalzala Hai Dil Mera - Poem by sanjay kumar maurya

क्यूंं जलजला है दिल मेरा, क्यूंं दुनियाँ है वीरान मेरी
एक बेवफा की उल्फत में खोई हुई है जान मेरी

मेरे ही ख्याल कर गये बेशुमार शिकायतेंं मुझसे
अब ना कोई वजूद है जहांँ मेंं, और ना ही कोई पहचान मेरी

कभी किसी दौर मेंं साथ थे तो फक्र था दिल को
कि सो गई वो गूरूरत कहींं, खण्डहर मेंं खो गई शान मेरी

शूरू कर दिया कलम ने मेरे सदा देना जमाने के रूबरू
जब नाहक तोड डाला दिल कोई कर दी बन्द जुबान मेरी

जख्मोंं के हर चूभन पे क्योंं न भला उफ करें हम
सालोंं तक सज सँवर के खत्म हुई है अरमान मेरी

खाकर कसम खुदा की भी बदल गया है बेमुरव्वत
पर उसी ईमानखोर पर अब तक टिकी है ईमान मेरी

हम वो थे कि कभी तबियत का अंंदाजा न था किसी को
अब दौर ए हाल ये है की बच्चा भी बता सकता है दास्तान मेरी

हम अब भी हैंं बेताब उतने ही उनसे बिछड जाने के बाद
मालूम है दिल को वह बन नहींं सकती हरगिज मुस्कान मेरी

Topic(s) of this poem: love and loss


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Poem Submitted: Tuesday, March 24, 2015

Poem Edited: Saturday, April 18, 2015


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