Yashovardhan Kulkarni


[व्यंग्य] गधे पे सवार मुकुटधारी - [satire] Gadhe Pe Sawaar Mukutdhaari - Poem by Yashovardhan Kulkarni

ठंडी तटस्थता था प्रयासों का उत्तर,
पैरों था चढ़ा जलता खंगर
था खरा पर, था खरा जरूर!
सोलह आने! सोलह आने!

शागिर्द बोलता, अब बस हुआ,
अगर ना हुआ तो क्या हुआ?
अरे ऐसे कैसे,
उदयोत है भाई अपनी तलवार

ब्योपार, ब्योपार
मार-काट, मार-काट
अवसरवाद, अवसरवाद
मार-काट, मार-काट
बेपरवाह क्यूँ ना हो तर्क आज
मार-काट, मार-काट
उदयोत है भाई अपनी तलवार
मार काट, मार काट!

तू मार, मैं काटूँ
तू काटे, मैं मारूं
भाई हम तोह सोच विचार से चकरा गए,
ललकार ही मैं अपने इच्छाएं को छट दिए,
अब क्यूँ चाहते हो इस शमशेर के जीवन का अवलोकन?
इस जूनून की बातों के लिए बताओ अब कौन ढूंड लाएगा दर्पण?

थके शमशेर क्यूँ करेंगे याद
कोई संयत कमल दीर्घ सुन्दर
निष्ठाहीन उदयोत जिसको भारी
धीर-सुधीर रास्ते के लिए करेगा क्यूँ यत्न,
भले ही हो दरकार तीव्र-तात्काली!

शांति और आराम में भी फरक हम ना पहचाने,
हम, सावध, सावध
सावध, सावध
हम, सावध सावध
शांति किरायदार, आराम है मालिक
हम, सावध, सावध
सावध, सावध
हम, सावध सावध
पहुंचे देखो कौनसी दावत!
यहाँ हो रही है आराम की ओर से तकरीर
बो रही अफीम शराफत, बोरी बोरी

मोर्चा हैं संभालें, गधे पे सवार मुकुटधारी
मंगवा रहें है, कुंडलियाँ चमकीली चमकीली
ये थके, निष्ठाहीन नतीजे के भिकारी!

Topic(s) of this poem: fulfilment


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Poem Submitted: Sunday, August 7, 2016

Poem Edited: Tuesday, August 9, 2016


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