Yashvardhan Goel


Unchai Aur Gehraii.. - Poem by Yashvardhan Goel

unchaiaur gehrai dra dete he mujhko.
na udna ata he na tairna mujhko..

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Topic(s) of this poem: art


Comments about Unchai Aur Gehraii.. by Yashvardhan Goel

  • Rajnish Manga (10/4/2015 3:11:00 AM)

    एक बढ़िया ग़ज़लनुमा कविता पढ़वाने के किये आपका धन्यवाद, मित्र यशवर्धन जी. अभिव्यक्ति का नयापन आकर्षित करता ह. कविता से एक उद्धरण:
    क्या राज़ है, इसी पे तो ऐतराज़ है मुझको
    ज़िन्दगी तू है कहाँ, अपना पता दे मुझको
    (Report)Reply

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