Rohitashwa Sharma


प्रतीक्षा और अभिलाषा

प्रतीक्षा और अभिलाषा

राह देखते आँखें ठहरी, आजाओ ना पास प्रिये
छोड़ जहाँ की दुनियादारी, आओ कुछ पल साथ जियें

पथरीली राहों पर चलते, जख्मी दोनों पांव हुए
बैठ पेड़ की छाँव तले अब, आओ अपने जख्म सियें

पैर थक गए बहुत अब मेरे, कन्धा दो ना बांह तले

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