shubham yadav


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वो देखो कितनी नज्में पड़ी हैं किनारे पर, कुछ मर गई हैं, कुछ तड़प रही हैं, कुछ ने तो अभी सांस लेना भी नही सीखा । तुम मुझे मंझधार में क्यों ले आये मेरी तकलीफ की नज्म भी वहीं कहीं पड़ी होगी आओ किनारे चल के ढूंढते हैं उसे । written - by me

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