Sushil Kumar

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Best Poem of Sushil Kumar

गुरु बंदना

गुरुवर तुम्ही बता दो किसकी शरण में जायें।
चरणों में जिसके गिरकर अपनी व्यथा सुनाएं।

अज्ञान के तिमिर ने चारों तरफ से घेरा।
क्या रात है प्रलय की होगा नहीं सबेरा।
होगा नहीं सबेरा...........
अनजान सी डगर पे कैसे कदम बढाएं।
गुरुवर तुम्ही बतादो...............

छल, दंभ, द्वेष, ईर्ष्या, साथी हैं सब हमारे।
वो कदम-कदम पे जीते हम हर कदम हारे।
हम हर कदम पे हारे.........
दिखला दो राह ऐसी पीछे ये छूट जाएँ।
गुरुवर तुम्ही बता दो........

अन्याय और हिंसा, बैसाखियाँ हमारी।
जिनके सहारे चलकर हमने उमर गुजारी।
हमने उमर गुजारी.......
पैरों को दो वो शक्ती ...

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जिन्दगी एक हादसा

वक़्त की करवट की संग में भी पलट कर रह गया।
मेरा साया मेरे क़दमों से लिपटकर रह गया।
आंसुओं की धार बनकर बह चला मेरा वजूद,
कल का समुन्दर आज क़तरों में सिमटकर रह गया।

जिन्दगी हमने जी हादसों की तरह।
उम्र अपनी कटी रास्तों की तरह।
मौत से मुंह छिपायें मगर किसलिए,
हमसे जब भी मिली दोस्तों की तरह।

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