Tarun Upadhyay


बढे कदम रुकते नहीं

बढे कदम रुकते नहीं

बढे कदम रुकते नहीं
रुके कदम बड़ते नहीं
पानी हो मंजिल तो
पीछे मुड देखते नहीं
माना है मुस्किले रास्तो में
सुनसान सड़क है और अँधेरी राते है
एक दिया तो जलाओ रस्ते खुद ब खुद जगमाएँगे

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