Vinod Pandey

Vinod Pandey Poems

बनी जिंदगी जंगल सा वन, शीशा-ए-दिल टूट चुका;
रही ना हिम्मत खुद से लड़ने, की अंतर्मन टूट चुका |
हुई परायी अपनी ख़ुशी जब, ग़मों से नाता जोड़ लिया;
हुए पराये अपने ही जब, रिश्तों ने मुख मोड़ लिया |
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धरम अपना निभाने से, किसी को दुःख तो क्या गम है;
मुकम्मल तो नहीं मै भी, मगर अपनी खबर ये है
कहे कोई, करे कुछ भी, मिली सौगात क्या कम है
वो मोड़ जिस पर पथ पृथक, मेरी सांसों में हरदम है |
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सच को झूठा साबित करना,
दुनिया कि पुरानी आदत है
तुम रहो सलामत आगे बढ़ो,
ये मेरी अपनी इबादत है
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गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?
महफ़िल भरी फितरतों से था वाकिफ; यकीं कर नहीं फ़िक्र करता कभी था,
मिली आज मंजिल कहे कोई कुछ भी, मुझे याद है जिक्र करता तब भी था |
बनी जिंदगानी, ये ऐसी कहानी, जता दो मुझे क्या कभी सुन सकोगे?
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देशद्रोह से बड़ा पाप, धरती पर अब तक हुआ नहीं
इसके माफीनामे को भी, किसी सत्ताधारी ने छुआ नहीं |
भले राम ने माफ़ किया हो, औरों ने अवलोकन की,
हनूमान को सभी पूजते, कोई नहीं बिभीषण की |
...

6.

मेरी उन शोहरतों का क्या, मेरे मौला पता दे दे,
वजह उन शोहरतों की जो, जरा उनको जता दे दे
संशय की घडी में आज, क्या करना बड़ी दुविधा,
हुई दुस्वार हम सबसे, ज़माने की बची सुविधा
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The Best Poem Of Vinod Pandey

जिंदगी के मोड़

बनी जिंदगी जंगल सा वन, शीशा-ए-दिल टूट चुका;
रही ना हिम्मत खुद से लड़ने, की अंतर्मन टूट चुका |
हुई परायी अपनी ख़ुशी जब, ग़मों से नाता जोड़ लिया;
हुए पराये अपने ही जब, रिश्तों ने मुख मोड़ लिया |
गिरे मूल्य रिश्तों के फिर से, अन्दर से मै टूट चुका;
बनी जिंदगी जंगल सा वन, शीशा-ए-दिल टूट चुका;
रही ना हिम्मत खुद से लड़ने, की अंतर्मन टूट चुका |
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