Sachchidananda Vatsyayan

(7 March 1911 – 4 April 1987 / Kushinagar, Uttar Pradesh / British India)

हँसती रहने देना - Poem by Sachchidananda Vatsyayan

जब आवे दिन
तब देह बुझे या टूटे, इन
आँखों को
हँसती रहने देना।

हाथों ने बहुत अनर्थ किये
पग ठौर-कुठौर चले,
मन के
आगे भी खोटे लक्ष्य रहे
वाणी ने (जाने अनजाने) सौ झूठ कहे

पर आँखों ने
हार
दु:ख
अवसान
मृत्यु का
अंधकार भी देखा तो
सच-सच देखा।
इस पार
उन्हें जब आवे दिन -
ले जावे
पर उस पार
उन्हें
फिर भी आलोक कथा
सच्ची कहने देना :
अपलक
हँसती रहने देना
जब आवे दिन


Comments about हँसती रहने देना by Sachchidananda Vatsyayan

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Sunday, April 1, 2012

Poem Edited: Monday, April 2, 2012


[Report Error]