Gangadhar Meher

(9 August 1862 - 4 April 1924 / Barpali, Bargarh, Orissa / India)

सीता-राम का दाम्पत्य प्रेम - Poem by Gangadhar Meher

सागर के प्रति
सरिता की गति
रहती स्वभाव से ।
जब शिला-गिरिसंकट
सामने विघ्न-रूप हो जाते प्रकट,
उन्हें लाँघ जाती ताव से ॥

भूल जाती सब
पिछली व्यथाएँ सागर से मिलकर ।
दोनों के जीवन में तब
रहता नहीं तनिक-भी अन्तर ॥

संयोग-वश यदि बीच में उभर
ऊपर को भेदकर
छिन्न कर डालता बालुका-स्तूप
सरिता और सागर के हृदय को किसी रूप;
वह स्रोतस्वती
मर तो नहीं सकती ।
सम्हालती अपना जीवन-भार
ह्रद-रूप बन हृदय पसार ॥

कहता हूँ और एक बात,
तुमलोग मन के साथ
सब सम्मिलित होकर
चलो हृदय-सरोवर ।
उधर अनन्त दिनों तक
रमते रहोगे रस-रंग में अथक ॥

वहाँ खिली है नयी पद्मिनी
मेरी जीवन-संगिनी ।
स्मरण का सूरज वहीं सदा जगमगाता,
अस्त कभी नहीं जाता ॥


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Poem Submitted: Saturday, September 15, 2012



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