Gautam kumar

Gautam kumar Poems

स्वर्गीय डॉ० कमल नयन को समर्पित
जीवन के रंग कमल के संग
बचपन कि कहानी ऐसी है, मोहक ये कमल के जैसी है!
तेरे आने से एहसास हुआ, घर में मानो दिव्य प्रकाश हुआ,
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सोच- सोच
क्या सोच यह अनमोल है, या जीवन का यह मोल है, तुम सोच कर यह सोच लो फिर उस सोच से कुछ बोल दो! इस सोच सोच के जज्बे में हेर एक सोच इठलाता है, हर एक सोच जाने कहाँ किस ओर लिए चला जाता है!
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Gautam kumar Biography

I am a mechanical Engineer from Kochgaon, Nawada, Bihar, India.)

The Best Poem Of Gautam kumar

Jivan ke rang Kamal ke Sang, स्वर्गीय डॉ० कमल नयन को समर्पित

स्वर्गीय डॉ० कमल नयन को समर्पित
जीवन के रंग कमल के संग
बचपन कि कहानी ऐसी है, मोहक ये कमल के जैसी है!
तेरे आने से एहसास हुआ, घर में मानो दिव्य प्रकाश हुआ,
आते ही छटा ऐसी बिखरी कुल को तुमपे ही नाज हुआ!
तू सूत्रधार मेरा भाई, तेरा ही प्यार मै हूँ भाई!
माता अहल्या का प्रथम लाल विभ्राट बीर पर्वताकार, सील विनय में परम श्रेस्ठ, ज्ञान विज्ञान में तू जेस्ठ!
जीवन तब बड़ी सुहानी थी गाँवों कि गलियां भी अपनी दीवानी थी!
तुम ठुमक ठुमक कर चलते थे मै रेंग रेंग कर चलता था!
माता फूली न समाई थी जब लाल, गौतम को अपने आँचल में पाई थी!
अपने दादा भी जस्न मानते थे, हमें गोद और तुम्हे कंधे पे बिठा गाँवों कि गलियों का सैर करते थे!
समय का कहें वह मनमानी था या अपने दादा का बस उतना ही कहानी था!
दादा के जाने से मन था अपनों का कुछ खली तब आई थी अपनी लाली, मनो फिर से घर में हो गई थी दीवाली!
हम सब मिलकर हुंकार भरते थे, धर्म कि जयजयकार करते थे!
बाल्यकाल से ही तू बहुत प्रभावी थे, दर्शन में निपुण और शिक्षा में मेघावी थे!
बहती समय के धार में, जीवन के नए श्रृंगार में हम बाल्यकाल को छोड़ चले अब किशोरपन कि ओर चले!
पठन-पठान में तेरा न कोई सानी था, यह किसी उज्जवल भविस्य का ही निशानी था!
जब तूने जीवन मूल्यों पर जोर दिया, हमने संघर्स का चादर ओढ़ लिया!
अपने पिता का था अटल विश्वास धर्म के दिए से करना है प्रकाश!
हमने मिलकर कर्मो पे जोर दिया जीवन ने पहला मोड़ लिया!
हम सब का बढ़ चला और कुछ समुत्साह, अपना परचम जब ग्राम स्तर पे छाया था, और श्रेस्ठता पाने का जीवन में जज्बा आया था!
न जाने कैसे फिर वह भिसन तूफान हुआ अपना घर बियाबान हुआ!
धर्म ध्वजा तब पहली बार मलिन हुआ लाली के जाने से जब अपनी माँ का अचल दिन हुआ!
उस झंझाबात ने तब जीवन क्रम ही तोड़ दिया, हमने प्रकीर्ति का घोर विरोध किया!
प्रकीर्ति ने मनो झुकना स्वीकार किया, लाली के बदले प्रतिक रूपी उपहार दिया!
जीवन में तब उत्साह प्रबल हुआ धर्म पे विस्वाश अटल हुआ!
हर एक सुबह तब मन को छू जाता था, मनो नया संदेश लेकर ही आता था!
अगले पड़ाव कि ओर अब हमें जीवन को ले जाना था, सफल जीवन धेय कि ओऱ मुखर हो जाना था!
समय के प्रवाह में तब कुछ उलझन आया था, मन तनिक जरा घबराया था!
जाने क्यों तूने कुछ दोहरे मापदंड किये जीवन मूल्यो में उदंड हुए!
पर मेरा था उत्साह बेजोड़ खीच लिया तुझे धर्म पथ कि ओर!
समाज के रीतियों का भी हमने कुछ ध्यान किया आगे जीवन के लिए गहरा अनुसन्धान किया!
कुछ जोड़ लिया कुछ छोड़ दिया जब हमने जीवन पथ में नया मोड़ लिया!
तुमलोग जरा घबराये थे मनो विपत्ति के बदल ही छाये थे, पर मेरा था उत्साह अटल तेरे ऊर्जा से ही तो पता था बल!
तू ही तुझको न जाने है गौतम तुझको पहचाने है!
हा तेरे ही बल कि थी आस मुझे तुझपे अटूट विस्वाश मुझे!
इसलिए तुझे समर्थन करता था सबकुछ तेरे हित अर्पण करता था!
ठम ठेल ठोक कर चलता था, कदम कदम पर संभल कर चलता था!
विघ्नो पे मै बरसता था हुंकार भरा ये करता था, तू अपनी छटा तो बिखेर जरा अपने बल बूते इन विघ्नो को घेर जरा!
पर हाय वीरता का सम्बल बस रह गया नाम तेरा और मै केवल!
ये धरती क्या तेरे लहू कि प्यासी थी या प्रकीर्ति को तुझे अपने आगोस में भर लेना था!
विधि ने क्या इसलिए हमारा निर्माण किया, क्या इसलिए हमने कमल भाई संग जीवन तत्वों का ज्ञान लिया!
हाय मर्माहत को वह चीत्कार, भिसन अग्नि में जलता अपना वह संसार!
ऐ लाल लाल अपनी माता चिल्लाती थी, क्यों असमा नहीं जल जाता था क्यों धरती नहीं फट जाती थी!
कभी झुकते थे कभी चलते थे अपने पिता जिन्दा ही चिता में जलते थे!
सबलोग सोच सोच घबराते थे यह बार बार चिल्लाते थे, प्रकीर्ति हाय कितना क्रूर हुआ कमल इस मासूम प्रतिक से दूर हुआ!
मै सुनसान कहीं खड़ा रहा इस झंझावात में जड़ा रहा, कैसे इस निर्मम सत्य को स्वीकार करूँ भाई का अंतिम संस्कार करूँ!
बढ़ खीच पास में लाकर के बिच ह्रदय में तुझे बिठा कर के, मै अंतिम यात्रा कि ओर चला पग पग हो घोर विभोर चला!
सोक संतप्त वह आलम था घर घर में छाया मातम था!
सब कहने लगे यह जन्मभूमि वीरान हुआ जब अग्नि लपटों में कमल नयन अंतर्ध्यान हुआ!
जीवन के मुस्किल डगर पे मै कैसे चल पाउँगा, युं लगता है तेरी यादों में जिन्दा ही जल जाउंगा!
क्या हमें अपने लक्ष्य तक न जाना था, सब खाक यही हो जाना था, तुम्हे हमें छोड़ चल जाना था हमें जीवन मूल्यों में गिर जाना था!
ये शैलाव मुझे झकझोर चला कुछ पता नहीं किस ओऱ चला!
मै बहुत घबराया हूँ इस सूनेपन से थर्राया हूँ!
मै बहुत मतबाला था तू कहता था कि मै हिम्मतबाला था!
पर यह देख दीनता का आलम, हर पल कलपता हूँ मै मन में क्यों आया मै इस जीवन में!
माँ- बाप का दुःख न टाल सकूँ इन बच्चों को भी न संभल सकूँ तो मेरा होना ही बेकार है, मेरा जीवन क्या प्रकीर्ति का एक उद्गार है!
इस भिसन डंक को झेलूं कैसे यह महा कलंक ले लूँ कैसे!
मुझे मर मर के अब नहीं जीना है इस जीवन हलाहल को अपने बलबूते पीना है!
क्या इस तरह जीवन संग्राम कर सकूंगा मै इस घोर विपदा को हर सकूंगा मै!
तूने दिया है सरताज मुझे रखनी है इसकी लाज मुझे!
मै निर्भीक खड़ा न हुआ जो आज क्या कहेगा यह सुर वीरों का समाज!
मै क्यों धरती पे आया था, जीवन मूल्यों कि इतनी तालीम क्यों पाया था, मेरे इस जीवन में तूने क्यों ज्ञान का पहला दिया जलाया था!
मुझे अपने पास तू खींच ज़रा उस दिव्य ज्ञान से सींच ज़रा, नैनों कि दहक़ को बुझाओ तू इसमें दिव्य ज्योति जगाओ तू!
तू अपने ह्रदय से जोड़ मुझे दे इन बिघ्नो का तोड़ मुझे!
तू सर पे रख दे हाँथ ज़रा, बस केह दे कि तू मेरे है साथ खड़ा!
फिर मै वाही ज्योत जलाऊंगा फिर से रन कौशल दिखलाऊंगा!
इन झंझावातों कि क्या विसात जो आ जाय सामने कल का भी हाँथ, यह खेल नया दिखलाऊंगा मै उसे तोड़ बढ़ जाउंगा!
ब्यूह पे ब्यूह फट जायेंगे संकट के बदल छट जायेंगे, जीवन में फिर न कहीं समर्पण होगा हर विपदा पे मेरा रन गर्जन होगा!
झेल सकूँ जो मै यह विशिख कराल, धरती पे मेरे संग अब न लाल, फिर और विघ्नो कि है क्या मजाल जो एक पल भी मेरे कोप को झेल पायेगा, कहीं दूर पड़ा वह शायद अपना अस्तित्व ही बचाएगा!
मै रोक नहीं रुक पाउँगा अपने मंजिल तक जाउंगा, दुनिया में तेरा संदेस पहुँचाऊंगा, फिर तेरे पास लौट कर आउंगा!
हम फिर से मिल जायेंगे तब मिलकर धूम मचाएंगे हर दिल में दिव्य ज्योति जलाएंगे तब कमल नयन हो जायेंगे!
जय हो कमल नभ में बिहरो भूतल में दिव्य आनंद करो, जन जन में जीवन कि आस भरो हर मन में दिव्य प्रकाश भरो!
हे अहिल्येय हे कमल नयन सत बार नमन सत बार नमन!

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