Shashikant Nishant Sharma

Rookie (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

शहरी कृतिमता - Poem by Shashikant Nishant Sharma

बदल गया है युग
आया है गया चुग
कृतिमता का
आधुनिकता का
भूल गये हम प्रक्रतिको
बदल लिया अपनी प्रक्रतिको
भूल गये सुबह का समुद्र हवा
जिसने कहा था पुर्वजो ने हवा
शहर मे है हमने देखा
सिर के ऊपर सुहब शाम
हिलते रहते है पंखा
हिलते रहना है इसका काम
पता नही कितनी गर्म है गर्मी
लगा दिया है घर मे कुलर
ढंड की भी परवाह नही
कहते है हम सदी
लगा दिया है एसी
वाताकुल
रहते है शहर मे हम
सालो भर एक सा मौसम
बाहर नही
अपने घर मे
कार्यचालय और दफतर मे
देखने को नही मिलेगें
हरे-हरे पेड़ पौधे कही
पर गर दफतर की दिवारो पर
कुल जंगल और पहाड़
के ही अनेक तश्वीर
लगा दिये है कील ढोककर
आने वाले अतिथियो के
भूल गये करना सत्कार
पर लिख कर टाँग दिया है गेट पर
स्वागतम
अतिथि देवो भवः
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


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Poem Submitted: Saturday, March 30, 2013



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