Shashikant Nishant Sharma

Rookie (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

खेल-खेल में भारत - Poem by Shashikant Nishant Sharma

हुआ पुरा एथेंस से एथेंस तक
पर हमने 1920 से 2004 तक
हमने क्या किया है अब तक
84 वर्षो में जीता है अब तक
8 स्वर्ण एक रजत और पाँच कार्य पदक
ओलिंपिक केल के महाकुम्भ में
देते है हर बार दस्तक
जीतकर एक दो पदक
देते है दिल को साँत्वना
चलो कम से कम तो
पदक तालिका में आया अपना नाम
इतना भी तो किया है खिसाड़ियों ने काम
यही बात दुहराते है करते है याद
हर चार साल बाद
और फिर सो जाते है
कुम्भ करण की नीद
आराम से तानकर चादर
यही काम करते है हर बार
एक खिलाड़ी के साथ हम
भेजते है दो अधिकारी कम से कम
और कहते है खर्च कर दिये
लाखो करोड़ो रूपये
ना होगा खेल जगत आबाद
जब तक रहेगा भाई भतिजावाद
कहते है चयन कर्ता अधिकारी
साहिल आप अभी है अनाड़ी
खेल मंञी के लड़के लगड़े
है लम्बी रेस के घोड़े
और खेल सचीव का भाई
आसमान सर पर उढा लेते है
जब लेते है जम्भाई
इनके लिये कुछ नही वेतलिपितंग
चयनकर्ता के भ्राता
है अंधो पर एक निशाना नही चुकता
चयन कमेटी यही कहता
अरे कब तक चलेगा यह खेल
क्या एक भरत आबादी में
नही पैदा होता चमत्कार्य खिलाड़ी
या अंधी हो गयी है आखे हमारी
गाँवो के वे दिलेर बच्चे
कर जाते पल भर में
पार लभालब भरे नदी को
क्या वे नही बन सकते
महान औलिंपिक तैराक
पर हम चुनते है
स्वीमिंग पुल में तैरने वाले बच्चें
क्या अर्जन और एकल्ब्य
नही पैदा हो तो मिलो की बस्ती मे
या नही रहा विस्वास हमे
उनके तीर कमानो पर
यदि आप को पता
तो दीजिए आप बता
क्या किर्केट के अलावा भी है कोई खेल
जो खेला जाता है भारत में
और खिलाड़ी अच्छा करने
को रहते है प्रचासरत
या चल देते है खेलने जब पड़ती है जरूरत
बिना किसी तैयारी के
जैसे ओलिंपिक महाकुभ में
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


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Poem Submitted: Saturday, March 30, 2013



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