Madhuraj Kumar

Rookie - 28 Points (13 March 1997 / Bagaha, Bihar)

घन बरसे... - Poem by Madhuraj Kumar

घन बरसे हैं जो इस सावन
भीग गया मेरा आँगन
सूखा सपना इक आर्द्र हुआ है
बूंदों ने जो मन को छुआ है

राह तकते नैनों में भी
उमड़ घुमड़ घिर आए हैं
बीते सावन के गीत पुराने
यादों ने फिर गाए हैं

ज्यों बूंदों भरे मेघों को देख
सूरज जल सा जाता है
इन भीगे पलों में साथ तुम्हारा
रह रहकर खल सा जाता है

यूँ बरखा तेरी आँखों की
बूंदों को क्यूँ ले आती है
क्यों कालिख इन काले मेघों की
मेरे दिल पर छा जाती है

क्यों मेघों के मध्य तुम्हारा
चेहरा उभर सा आता है
बूंदों के गिरने के स्वर में
वक़्त ठहर सा जाता है

कब आओगे ओ मीत मेरे
जो अधरों पे हों गीत मेरे
सूखे नयनों से ही तेरे
दर्शन को अब मैं तरसूँ
आओ कि इस सावन में
मैं भी घन बन बरसूँ...


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Poem Submitted: Sunday, July 27, 2014



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