Kazim Jarwali

(15 June 1955 / Jarwal / India)

फ़िक्रे-रवां - Poem by Kazim Jarwali

दुनिया का सफ़र करता हुं मै खुद से निकल कर,
तन्हाई मै खुलते है नए दर मेरे अन्दर ।

एक नूर सा होता है मुनव्वर मेरे अन्दर,
खुलता है सहीफ़ा कोई अक्सर मेरे अन्दर ।

दरियाओं के पानी से मै मरऊब नहीं हुं,
पहले से है मौजूद समन्दर मेरे अन्दर ।

"काज़िम" मै हमेशा से उसी का हुं मुक़्क़लिद,
तबलीग़ कुना है जो पयम्बर मेरे अन्दर ।।


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Poem Submitted: Tuesday, April 10, 2012

Poem Edited: Tuesday, April 10, 2012


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