Kazim Jarwali

(15 June 1955 / Jarwal / India)

हंसती हुई कली - Poem by Kazim Jarwali

यां ज़िन्दगी के नक्श मिटाती है ज़िन्दगी,
यां अब चिराग पीता है खुद अपनी रौशनी।

इन्सां का बोझ सीना-ऐ-गेती पे बार है,
हर वक़्त आदमी से लरज़ता है आदमी ।

रेत उड़ रही है सूखे समंदर की गोद मे,
इंसान खून पी के बुझाता है तशनगी ।

वो दौर आ गया है कि अफ़सोस अब यहाँ,
मफहूम इन्किसार का होता है बुज़दिली ।

पैदा हुए वो ज़र्फ़ के ख़ाली सुखन नवाज़,
इल्मो-ओ-अदब कि हो गयी दीवार खोखली ।

पिघला रही है बर्फ मुहब्बत का चार सु ,
नफरत कि आग जिस्मो के अन्दर छुपी हुई ।

रंगीनियाँ छुपी है दिले सन्ग सन्ग मे ,
होंटो पे फूल बन के टपकती है सादगी ।

ढा देगी बर्फ बनके हक़ीक़त कि एक बूँद,
कितने दिनों टिकेगी ईमारत फरेब की ।

शिकवे जहाँ के भूल गया ज़ेहन देखकर ,
"काज़िम" शजर की शाख पे हंसती हुई कली ।।


Comments about हंसती हुई कली by Kazim Jarwali

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Tuesday, April 10, 2012



[Hata Bildir]