Shashikant Nishant Sharma

Rookie (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

?? ?? ??? ??? ???? ?????? ??? ??? - Poem by Shashikant Nishant Sharma

जो थे कुछ दिन पहले
बहारों में पले
वे लम्बे लम्बे वृक्ष
जो थे आँखों के समक्ष
हरे हरे पत्तों से लदे
हर तरह से भरे पुरे कह दे
वे हरे हरे पत्ते
वे मखमली पत्ते
न रहा उनकी ताजगी
न रहा वो उमंग
बदलने लगा उनका रंग
पड़ने लगे वे पीले
जो थे कुछ दिन पहले
बहारों में पले
क्यों बदल रहे उनके रंग
मेरे मन में छिड़ा जंग
मैंने सोचा
सहयाद दल रही उनकी उम्र
पद रही इनकी सांसे नर्म
पर यह क्या?
पत्ते तो पीले हुए
पीले पीले होकर
शायद शोकपूर्ण मुद्रा में
लेकर अपनों से विदा
हो गए जुदा
पेड़ से अलग
पत्तों के बगल
मुक्त मस्त पवन में
इधर उधर
हिलते डोलते
गिड़ने लगे
निचे धरती
उन्हें बुलाती
हाथ पसारे
गले लगाने को
उन्हें शरण देने को
अपनी गोद में
पर ये पत्तों की बात नहीं
सब के लिए हैं सही
न जाने कब मौत बुलाले
जो थे कुछ दिन पहले
बहारों में पले
एक के बाद एक पत्ते
यूँ ही गिड़ते गिड़ते
पेड़ के सरे पत्ते
गिड़ गए
पेड़ हो गया पत्र विहीन
रंग मलिन
बहुत ही दीन-हीन
लगने लगे
दिखने लगे
मनो पेड़ की सारी संपत्ति
लूट चुकी हो
वो हो कंगाल
एकदम बेहाल
बेखबर बाबले
जो थे कुछ दिन पहले
बहारों में पले
तभी हमें लगा
हमें पता चला
शायद आ गयी हैं
वही आ गयी हैं
पतझड़!
इसीलिए गये हैं उजड़
अनगिनत पेड़
पर नहीं सब पेड़ नहीं
इस मौसम में भी
बहुत पेड़ हाँ अभी
झाड़ते नहीं कभी
ये हैं सदाबहार पेड़
इनके लिए बहार अनंत
हर मौसम वसंत
इनके अंदाज निराले
ये बहारों में पले
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


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Poem Submitted: Saturday, March 30, 2013



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