ajay srivastava

Rookie - 193 Points (28/08/1964 / new delhi)

हाथ - Poem by ajay srivastava

थाम लेते है तो सफर मे
समय का अहसास नही होता है
कलम ऊठा ले तो गीत व महाकाव्य बन जाते है
हथियार ऊठा ले तो रक्षक हो
फिर तो दुशमन को झुका भी देते है
और जुड जाए तो पक्ष प्रतिपक्ष सम्मान को दिला देते है 11

आगे बडते है सबको अपने पन का अहसास करा दे
देते है तो किसी की झोली खाली नही देते है
झूक जाए तो दोहरा आनंद दिला देते है
एक तरफ आशीर्वाद तो दूसरी तरफ सम्मान
दोनो काम एक साथ कर लेते है 11

हाथ तो हाथ है
चाहत सबकी अपनी अपनी
जिस रूप को अपना लोगे
उसी रूप का रंग आएगा 11


Comments about हाथ by ajay srivastava

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Tuesday, August 6, 2013

Poem Edited: Tuesday, August 6, 2013


[Hata Bildir]