Sandhya Jane


अधुरे ख़्वाब... - Poem by Sandhya Jane

मंझिलों को मेरे मुट्ठियों में,
ख़ुशियों को मेरे क़दमों में,
मुसकुराटों को मेरे होंठों में,
बाहों के उन एहसासों में।
और, फिर खो जाना चाहती हुँ
सुबह की उन अधुरे ख़्वाबों में।।


इस सुरज को अाने से,
उस चाँद को जाने से,
उन ख़्वाबों को टूटने से,
इन सबको रोकना चाहती हुँ मैं।
और, फिर खो जाना चाहती हुँ
सुबह की उन अधुरे ख़्वाबों में।।

- Sandhya

for more poems, pls visit: https: //www.facebook.com/SandhyaJane

Topic(s) of this poem: dream


Comments about अधुरे ख़्वाब... by Sandhya Jane

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Thursday, July 24, 2014

Poem Edited: Thursday, July 24, 2014


[Hata Bildir]