Madhuraj Kumar

Rookie - 29 Points (13 March 1997 / Bagaha, Bihar)

स्वतंत्रता के पीछे - Poem by Madhuraj Kumar


सदियों से बंद
वह अँधेरी कोठरी
जिसमे छुपे हैं अंधकार के कई पहलू भी
एक दिन अचानक इतनी उर्जा कहाँ से आ गई
कोठरी की जंग लगी बंद खिड़की
सहसा खुल पड़ी
प्रविष्ट हुईं प्रकाश किरणें
कोठरी का इक कोना प्रकाशित होने लगा
उस कोठरी की हवा को शक्ति बोध होने लगा
निकल पड़ी वह उस खिड़की से
इस अँधेरी दुनिया से
प्रकाश में गुम हो जाने
घूमे उसने धरा क्षितिज
सागर की लहरों पर तैरी
किन्तु इक पर्वत से टकराई जब
खंड खंड उसके उस क्षण हो गए
उसके कुछ हिस्से को विराट पवन ने
खुद में यूँ मिला लिया कि वह
उसका अंश ही बन चुकी
चलती वह उसकी गति के साथ
सहारा भी देती कभी
कभी प्रकाश का मार्ग दिखा
संग वह चलती रही
उसके गंतव्य तक


किन्तु उसकी वह बहन
जिसे वह परतंत्र लगती थी
उसके आनंद को उसके समर्पण को
महज़ उसकी विवशता समझ बैठी थी
और प्रेम था जिसे अपनी पूर्ण स्वतंत्रता से
अकेले निकल पड़ी धरती का चक्कर लगाने
अचानक वह खिंचकर आ पहुंची
एक गरम भट्ठी में
उसके तन का हर हिस्सा जलने लगा
खुद को कोसते हुए, पछताते हुए
जब वह कुछ हलकी हुई
उसने खुद को समेटा
किन्तु प्यारी थी अभी भी उसे
पूर्ण स्वतंत्रता
अपने साथ हुई इस दुर्घटना को भूल
जब वह कुछ आगे बढ़ी
अचानक आया इक चक्रवात
उसमे वह खिंचती गई
उसने उसे खूब नचाया और
तोड़ मरोड़कर रख दिया
उसने बहुत कराहा
चिल्लाने की कोशिश की
किन्तु उसके मुख से एक शब्द भी
चक्रवात ने न निकलने दिया
टूट कर यूँ बिखर गई वह
खो चुकी अपना अस्तित्व
पूर्ण स्वतंत्रता की तलाश में

किन्तु उसकी वह बहन जिसने
ज़िन्दगी से हाथ मिलाया
उसी रूप में
बन चुकी थी शीतल पवन
क्योंकि उसे पता था
वायु अंधड़ नहीं
मद्धम, कोमल और शीतल
और सौम्य होनी चाहिए
क्योंकि गुण उसका यही है
आंधी बनकर वायु
विनाश कर सकती है.सृजन नहीं
तत्वों के संग घुलकर
सृजन उसे करना था
स्वतन्त्र होकर विनाश नहीं ।


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Poem Submitted: Thursday, July 3, 2014



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