Madhuraj Kumar

Rookie - 320 Points (Bagaha, Bihar)

तुम्हें ही... - Poem by Madhuraj Kumar

तुम्हें ही
दूर आसमाँ के साये में इक चेहरा उभरते देखा है
हवा की थिरकन में इक जादू तिरते देखा है
फूलों में कलियों में किसी को महकते देखा है
सूर्य की अग्नि बन कर किसी को दहकते देखा है
आसमाँ में चाँद को किसी से शर्माते देखा है
इन काली घटाओ में उन जुल्फो को लहराते
देखा है
इन जल लहरों के अंतर में इक मस्ती उमड़ते
देखा है
नीले नभ में इन मेघो पर
बैठकर उड़ते देखा है
धरा और गगन को क्षितिज पर मिलते देखा है
इन मस्त फिजाओं में किसी को घुलते देखा है
..हाँ, मैने तुम्हें ही देखा है
वह तुम्ही हो जिसे मैने कण-कण में समाते देखा है
मेरी इन साँसों में आते जाते देखा है।

Topic(s) of this poem: love


Poet's Notes about The Poem

to you..my special one i m searching u in entire nature and i always find u in the core of my heart...you are my way to life

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Poem Submitted: Wednesday, October 9, 2013

Poem Edited: Thursday, July 3, 2014


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