Nirvaan Babbar

Rookie (04/03/1975 / Delhi)

शायद (Shaayad) - Poem by Nirvaan Babbar

चलो सो जाएँ ऐ रात, दर्द सीनें मैं है कहीं,
शायद आराम इस जहाँ मैं, सोते मैं ही मिल जाए,

क्या कहें शायद ख़वाब मैं ही कहीं, तक़दीर का दीदार हो जाए,
ज़ख़्म सीने के शायद, ख्वाबों मैं ही कहीं, सिल जाएँ,

उलझे हुए सवालों के, शायद ज़वाब वहीँ मिल जाएँ,
शायद सुरों को राग बनाने वाली, कोई बंदिश मिल जाए,

बंधे से बैठे हैं, जब से खुलीं हैं आखें,
बंद कर इन पलकों को, शायद आज़ादी मिल जाए,

नींद की आगोश मैं ही, शायद ख़ुद को हम जगा पाएं,
चलो मरने से पहले ही सही, लेकिन, इस जहाँ को, एक बार देख तो जाएँ,

निर्वान बब्बर

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INDIAN COPYRIGHT ACT,1957 ©


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Poem Submitted: Monday, December 2, 2013

Poem Edited: Wednesday, December 25, 2013


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