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(17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

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Mukh sakshi

मूक साक्षी बनकर देखते रहे

में नहीं जानता देशवासी क्या कहते है
में यह भी नहीं जानता उनके दिल में क्या है
मैंने कभी कोशिष ही नहीं की जाननेकी
बस जी रहा हु और राह देख रहा हुं मरनेकी

उन्हें आदत हो गयी है हमें लुट्नेकी
हमें आदत हो गयी है उनको सुननेकी
वो कहते क्या है और करते क्या है?
पता नहीं ये सब माजरा क्या है?

कोई कह रहा है देश जाय भाड़ में
चाहे वो बह जाय भीषण बाढ में
मेरे लिए क्या कर रहे हो?
दे दो जो मांग रहा हू फिर सत्ता में बने रहो

ये नहीं सुधरेंगे, हमें ही कुछ करना पड़ेगा
हमारी दुर्दशा करनेवालों को भुगतना पड़ेगा
इन्हें ना कोई ईमान है न कोई धरम
हमें ही धोने पड़ेंगे उनके करम

मुलायम 'मुलायम' बनके रह गया
माया का जादू न चला और पूरा राज ही ढेह गया
लाली अब आलू बेचेंगे और पासवान 'वांन ' चलाएंगे
ये तिकड़ी बदमास निकली अब हम उन्हें मजा चखाएंगे

लालू चारा खा गया और 'शरद' ने चाँद ढक् दिया
गारीं की प्याज और आलू ही गायब कर दिया
चीनी की मिठास पुरे जीवन के लिए फीकी कर दी
अब कहता है ' में नहीं लडूंगा'यारो ये तो हर ही कर दी

त्यागी का त्याग तो देखो
हेलिकोप्टर में कमाल तो देखो
पूरा दस टका अपनी जेब में
देश जाय जेह्न्नुम में

वढेरा करोडोपति या अर्बोपति बन गया
देश को उन्होंने अधोगति में धकेल दिया
मेरे देस को अब क्या देखना बाकी है?
पूरा नेहरु खानदान सरपे थोपना बाकी है?

एक कुंवारा रह जाएगा दिखाने के लिए
एक गद्दी छोड़ देगा बतानेके लिए
राज अपना चलता रहे, देश बर्बाद होता रहे
बस हम मूक साक्षी बनकर देखते रहे

Submitted: Tuesday, March 19, 2013


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