Jaideep Joshi


देर न हो जाए - Poem by Jaideep Joshi

कितना समय हुआ जब आपने अंतिम बार अनुभव किया?

श्वास में वायु का आनंद;
जल का जीवनदायिनी स्वाद;
आकाश में तारों का सौन्दर्य;
फूलों की पंखुड़ियों का रेशमी स्पर्श;
हवा में थिरकते पत्तों का मधुर गीत;
पक्षियों के कर्णप्रिय कलरव का संगीत;
वर्षा की प्रथम फुहार से तृप्त मिटटी के सौंधी सुगंध;
अपनी अंतरात्मा की आवाज़ की सच्चाई।

तो शीघ्र जीवन के इन अमूल्य उपहारों से
लाद दो स्वयं को;
कहीं देर न हो जाए!


Comments about देर न हो जाए by Jaideep Joshi

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Wednesday, June 26, 2013

Poem Edited: Wednesday, June 26, 2013


[Hata Bildir]