Lalit Kaira

Rookie - 496 Points (13/04/1985 / Binta, India)

एक क्षण - Poem by Lalit Kaira

छौने सी उछलती
नन्ही चुलबुली लड़की
उसकी कुलांचे देखकर लगता है
कि ये ब्रह्माण्ड,
जिसे सब निस्सीम कहते हैं
छोटा पड़ जाएगा।
उसके चेहरे की खुशी
मानो
मानो सबको अपने आगोश में ले लेगी
हर कोने में
हर जर्रे में
खुशियाँ ही खुशियाँ बिखर जाएंगी
और सच कहता हूँ
वो छोटा हरा पहाड़ स्वर्ग का बगीचा बन गया है
और वो पतली नदी
...अमृत का दरिया
इस छोटे कालांश में
न जाने कितने कल्प बीत गए है और मैं काल
की
तेज रफ्तार से भूत-भविष्य-वर्तमान
की परिक्रमा कर रहा हूँ|

Topic(s) of this poem: philosophy


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Poem Submitted: Monday, July 21, 2014

Poem Edited: Monday, July 21, 2014


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