hasmukh amathalal

Gold Star - 34,455 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

बन्दर नाच रहा है Bandar Mach Rah - Poem by hasmukh amathalal

बन्दर नाच रहा है

वैसे तो मे कभी पीता नहीं
बहेक जाना मेरी आदत नहीं
फिर न जाने क्यों आज में बहेक गया
थोडा सा गुमान बस सर पर सवार हो गया

कवी तो हम थे नहीं
कविता क्या होती है उसका भी ज्ञान नहीं
पर समज लो कालिया से कालिदास हो गए थे
कविता बस बिंदास हो कर लिख लिया करते थे

पता नहीं कौन सा कीड़ा मन में घर कर गया?
हमें हवा में उडने पर मजबूर कर गया
सब हमें ऐरे गेरे नथ्थू लगने लगे
हम अपना ही राग आलाप ने लगे

कहीं से आवाज तो जरुर आयी
'रुक जा, ये बात तेरी संमज से बाहर क्यों हो गयी'?
यहाँ तो हजारो फ़नकार अपनी दूकान लगाये बैठे है
तु अपनी डफली बजा सके इतनी हैसियत ही कहाँ है?

बात बात में मुझे बन्दर की संज्ञा मिल गयी
मानो सबक के रूप में सजा मिल गयी
क्यों बहेक जाना इस ज्ञान के मंदिर में?
बड़े कवी भी हो गए तो क्या मिलेगा आखिर में

भैया हमारी सांन तो ठिकाने आ गयी
रही सही आबरू लीलाम होते होते बच गयी
ना जाने लोग क्या क्या सोच लेते हमारे बारे में?
बन्दर नाच रहा है पर लगाम है किसके हाथ में?


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Poem Submitted: Tuesday, October 1, 2013

Poem Edited: Tuesday, October 1, 2013


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