hasmukh amathalal

Gold Star - 34,296 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

जिन्दगी भी संवार देगी jindgi bhi - Poem by hasmukh amathalal

जिन्दगी भी संवार देगी

मैंने धीरे से आवाज लगाई
बस भीड़ में दबकर रह गयी
मेरी दौड़ सिमित थी और सिमित रह गयी
लोग आगे बढ़ गए और में देखती ही रह गयी

वो भीड़ में अकेला था
मासूम सा चेहरा था
पर गमगीन और उदास था
मेरे पीछे बना हुआ देवदास था

मैंने भी दिल दे दिया था
बस मिलने का वादा भी किया था
मुझे नहीं पता था भीड़ इस कदर बढ़ जाएगी!
मेरी महोब्बत का इस तरह मजाक उड़ाएगी

उसके चेहरे की लकीरे मुझे असमंजस में डाल रही थी
'अलग हो जाने के डर से आतंकित कर रही थी '
मैंने सोचा मेरी दौड़ कहा तक जायेगी?
ये सब दुविधाए कैसे समलेगी?

मेरा निजी जीवन निष्काम और पाक रहा है
मैंने सपने में भी किसी का दुःख नहीं चाहा है
में उसकी चाहत का मजाक बनते देख नहीं सकती?
यही मेरी घड़ी है उसका इन्तेजार में नहीं कर सकती

मैंने आव्हान किया और हाथ आगे बढ़ा दिया
'उसने भी सच्ची मोहब्बत का रंग दिखा दिया '
थामा लगन से हाथ और जामे अंजाम दे दिया
हमें गलत इल्जाम देने की फिराक से बचा लिया

कौन कहता है प्यार में ताकत नहीं होती?
कौन सोचता है किनारेको किश्ती नसीब नहीं होती?
करो दिल से पुकार नदी अपना रुख बदल देगी
प्यार तो ठीक है पर साथ में जिन्दगी भी संवार देगी


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Poem Submitted: Saturday, October 19, 2013

Poem Edited: Tuesday, October 22, 2013


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