hasmukh amathalal

Gold Star - 44,856 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

कोशीश वाहवाही की करते है..koshis vahvaahi - Poem by hasmukh amathalal

कोशीश वाहवाही की करते है

ना माना उसने मेरा कहना
में चाहता था बस मर जाना
पर क्या आया दिल में की में जी गया
जीवन में फिर नशा ही नशा छा गया।

वो कहती गयी, में सुनता गया
बहारो ने भी है केहर ढाया
उपर से है किस्मत का साया
कुदरत का ये खेल मुझे बहुत ही भाया।

माया के नखरे बहुत होते है
सबके जेहन में बहुत सारे सवाल होते है
उनका हल ढूंढना सब के बस की बात नहीं होती है
'हर काम के पीछे एक नाम'की तकती होती है।

हर हाल में है मुझे उसे पाना
नहीं तो हो जायेगी किरकिरी ओर अफ़साना
कुदरत की शक्ति को है मैंने माना
में फिर भी नहीं मानता की हो गया है फ़साना।

वो मेरी शक्ति का प्रदर्शन है
उसमे एक प्रतिकूल हवा का दर्शन है
वो कभी हंसके भी नकारती नहीं है
मेरी हर बात को दिल से स्वीकारती रही है।

मुझे साफ़ दिल से ये बात कहनी चाहिए
नारी का चयन भी खुले दिल से होना चाहिए
माँ बाप की और से किसी अनचाही मांग नहीं की जानी चाहिए
हर तरह से ख़ुशी का माहोल और शादी कि रोशनी होनी चाहिए

मुझे चाहिए था उसका हाथ
सोचा है चलेंगे साथ साथ
हर जीवन में एक बदलाव जरुरी है
जैसे नदी में पानी का बहाव उतना ही जरुरी है

कहने को तो सभी यह बात करते है
पर दहेज़ और गहनो की मांग करते है
गरीब माँ बाप अपनी इज्जत कि बहुत ही परवाह करते है
मज़बूरी में भी कोशीश वाहवाही की करते है


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Poem Submitted: Thursday, April 10, 2014

Poem Edited: Thursday, April 10, 2014


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