hasmukh amathalal

Gold Star - 45,721 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

सम्हाल रहे थे धुरा samak rahe the - Poem by hasmukh amathalal

सम्हाल रहे थे धुरा पुस्तेनी

ना हँसे हम उनपर
और ना हँसे वो हमपर
बस दर किनारा करते गए
ज़माने के साथ साथ चलते गए

किस्मत का खेल था जो जादू कर गया
बहता पानी एकदम गन्दा हो गया
मलिन विचार थे उनके हमारे लिए
बस वो ही काम गर गये जब आप बददुआ दे गए

रास्ता कहाँ से बदलते, जब होश ही नहीं था?
आपको खोने का गम सताए जा रहा था
बीच भंवर में हम ऐसे फंसे थे जैसे तुफान आनेवाला था
हमारे भाग्य को वह बुरी तरह से तहसनहस करनेवाला था

मन में हम खूब ठानी और हर ख़ाक को छानी
पर मन की मन में रह गर बनकर कहानी
हम सोचते रहते थे उनकी मंद मंद हंसी पर
पर यहाँ तो जान थी फंसी थी कगार पर

आप थाम लेते यदि हमारी डूबती नैया
हम आज भी रहते आपके छबीले छैया
पर भाग्य को ये मंजूर नहीं था
और आपका सहयोग आनेवाला नहीं था

हम रह गए जहर का घूंट पीकर
मानो शहद बचा हो शहीदी पर
हम चले थे प्यार की उस राह पर
जहाँ पर अपने तो सब थे, पर हँसते थे 'आह' पर

माना की आप भी डरे डरे और सहमे सहमे थे
पर आप चुस्त और सही खेमे में थे
हमारा हाल कुछ अजीब सा था
आप तो थे करीब, पर में बन गया गरीब सा था

ना छुट रही थी वो गमगीनी
और नाहीं छुट रही थी नादानी
दिल को मानो घेर रही थी बेचेनी
जैसे हम सम्हाल रहे थे धुरा पुस्तेनी


Comments about सम्हाल रहे थे धुरा samak rahe the by hasmukh amathalal

  • Gold Star - 45,721 Points Mehta Hasmukh Amathalal (10/20/2013 10:48:00 AM)

    sunil Kumar likes this. Hasmukh Mehta welcome a few seconds ago · Unlike · 1 (Report) Reply

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  • Gold Star - 45,721 Points Mehta Hasmukh Amathalal (10/20/2013 10:47:00 AM)

    Pawan Jaiswal likes this. Hasmukh Mehta welcome a few seconds ago · Unlike (Report) Reply

  • Gold Star - 45,721 Points Mehta Hasmukh Amathalal (10/20/2013 10:42:00 AM)

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Poem Submitted: Sunday, October 20, 2013

Poem Edited: Tuesday, October 22, 2013


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