Kumar Mohit


Pida (Pain) - Poem by Kumar Mohit

राग-रागिनी इतने छेड़े, पर इनका कुछ न सका;
उठा लिए कितनो ने बीड़े, पर इनका कुछ सका;

इतने निष्ठुर, इतने पापी,
कुछ इंसा जो बन से गए हैं;
लगता है इस जनसँख्या में,
कुछ रावण, कुछ कंस हुए हैं;
स्वाभिमान और स्वविवेक की,
निर्मम हत्या कर डाली;
इतनी शिक्षा पा कर भी,
मिटटी संग मिला डाली;
इंसानो के वंशज होकर, भी इनका कुछ हो न सका;
उठा लिए कितनो ने बीड़े, पर इनका कुछ हो न सका;

छोटी-छोटी नन्ही कलियाँ, जो खिलने को आतुर हैं;
भोली, प्यारी सूरत इनकी बरबस मन को मोहे है;
इस पर भी उन्हें तरस न आता, खुद को जाने क्या है समझते;
मर्द होने का दावा करके, नपुंसको सा काम है करते;
सज़ा सुनाएं इनको कैसी, इसका निर्णय हो न सका;
उठा लिए कितनो ने बीड़े, कुछ हो न सका;

कभी-कभी रोना है आता, और आँखें भर जाती है;
हमसे बेहतर पशु है लगते, हम व्यर्थ सर्वोत्तम जाति है;
कम से कम शिक्षा आभाव का, दुरुपयोग तो नहीं ये करते;
पर ये पापी शिक्षित होकर, ऐसे गंदे काम हैं करते;
किन कर्मों को लक्ष्य बनाकर ऐसा जीवन दिया;
प्रभु से पूछे इस सवाल का, उत्तर मुझको मिल न सका;
उठा लिए कितनो ने बीड़े, पर इनका कुछ हो न सका;

राग-रागिनी छेड़े, पर इनका कुछ हो न सका ;
उठा लिए कितनो ने बीड़े, पर इनका कुछ हो न सका;


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Poem Submitted: Saturday, May 3, 2014



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