sanjay kumar maurya

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संकल्प - Poem by sanjay kumar maurya

पर्वत
मैदान
जंगल
रेगिस्तान
सब लाॅघकर निकलेगी
नदी!
लहराएगी सरीता
घाट घाट
हरहर की ध्वनि के साथ ।

अथाह दूरियाॅ
चीरकर निकलेगी नाव
सागर में
राहों का निर्माण करती हुई
व पहुॅचेगी
किनारे तलक
जहाॅ है उसकी मंजिल।

घनघोर बादलों को
भेदकर निकलेगा
प्रकाश का पुंज
सूर्यदेव की शरीर से
जग को आलोकिक करने
कण कण में जीवन भरने।

और
असंख्य बाधाओं से होकर
गुजरेगी
संकल्प रुपी तीर
मस्तिष्क रुपी कमान से
मनरुपी डोरी का सहारे निकलकर
अपने लक्ष्य को भेदने हेतु।

Topic(s) of this poem: poem


Comments about संकल्प by sanjay kumar maurya

  • Rajnish Manga (9/16/2015 11:39:00 PM)


    सच कहा आपने. मन में दृढ़ निश्चय हो और लगन हो तो कोई भी मंजिल प्राप्त की जा सकती है. कविता से एक बानगी: सब लाॅघकर निकलेगी / नदी! / अथाह दूरियाॅ / चीरकर निकलेगी नाव / राहों का निर्माण करती हुई /... पहुॅचेगी / किनारे तलक / जहाॅ है उसकी मंजिल। (Report) Reply

    Sanjay Kumar Maurya Sanjay Kumar Maurya (6/17/2016 7:22:00 AM)

    धन्यवाद, सर्

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Poem Submitted: Tuesday, September 8, 2015

Poem Edited: Wednesday, September 9, 2015


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