Abhishek Omprakash Mishra

Freshman - 722 Points (19 Sept / Orai)

तुम्हारे बिन मुझे ओ माँ ये घर अच्छा नहीं लगता - Poem by Abhishek Omprakash Mishra

ज़माने भर की रौनक है, मगर अच्छा नहीं लगता
कोई दरगाह या कोई दर, मुझे अच्छा नहीं लगता
न भाता अब ये आँगन ही, न भातीं अब ये दीवारें
तुम्हारे बिन मुझे ओ माँ ये घर अच्छा नहीं लगता

कवि अभिषेक मिश्रा 'अपर्णेय'

Topic(s) of this poem: love and art


Comments about तुम्हारे बिन मुझे ओ माँ ये घर अच्छा नहीं लगता by Abhishek Omprakash Mishra

  • Rajnish Manga (10/24/2015 12:44:00 PM)


    बहुत सुंदर, बहुत मधुर. माँ की ममता अतुलनीय है. इसी ममता को समर्पित आपकी कविता कथ्य तथा अभिव्यक्ति में बहुत ऊँची है. धन्यवाद, मित्र. (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
Read all 1 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Saturday, October 24, 2015

Poem Edited: Saturday, October 24, 2015


[Report Error]