Ajay Srivastava

Gold Star - 11,191 Points (28/08/1964 / new delhi)

जरा सोचिये - Poem by Ajay Srivastava

कभी प्यार का प्रदर्शन
कभी क्रूरता का प्रदर्शन
बनाने वाले की गलती कहुँ
या फिर समय का दोष कहुँ

सुख की छाव और मधुर स्वाद को
पल भर में निजी स्वार्थ के लिए उजाड़ देना।

मासूम वन्य जीवन से प्यार जाताना
अगले ही छण
उन्ही का खून पीते हो।
उन्ही का भोजन बनाते हो।

यह तो अहसास मानवता का या फिर क्रूरता का
मानवता और आतंक में अंतर का एहसास।

दोनों में मारने की एकरूपता है।
मानवता बेजुबान को मारती है।
आतंक बोलने वालो को मारती है।
और प्रकृति दोनों से एक साथ हिसाब कर लेती है।

परमपिता परमेश्वर का मानवता को
कहो ना संतुलन का सन्देश है।
जरा सोचिये

Topic(s) of this poem: think


Comments about जरा सोचिये by Ajay Srivastava

  • Rajnish Manga (12/3/2015 7:05:00 AM)


    मानवता बेजुबान को मारती है।
    आतंक बोलने वालो को मारती है।.... मैं आपके इस विचार से सहमत हूँ कि कुछ समाज विरोधी तत्व वन्य पशुओं को व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चोरी से मारते हैं. इसे रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिये. आतंक पर तो आजकल विश्व भर की नज़र है.
    (Report) Reply

    Ajay Srivastava Ajay Srivastava (12/4/2015 4:02:00 AM)

    T'hanks

    0 person liked.
    0 person did not like.
Read all 2 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Thursday, December 3, 2015



[Report Error]