Ajay Srivastava

Gold Star - 11,191 Points (28/08/1964 / new delhi)

हम सब - Poem by Ajay Srivastava

सोने की तरह चमक तुझ मे
सबको अपने मे समहित करने वाला ह्रदय तुझ मे
विवधता की समपुर्णता समाई है तुझ मे
सहज ही सबको अपना बना लेता है|

मतभेद को बडी सरलता से दूर करने की शक्ति तुझ मे|
मानवता को हमेशा प्रोतसहित करना तेरा कर्म है|
सबको एक सा मान और सम्मान देना तेरा स्वाभाव है|

यही तो तेरे असतित्व की पहचान है|
यू ही नही नदीयो को पूजते है यहॉ पर
यू ही नही विभन्न धर्म के लोग यहॉ शीष झुकाते है|
यही है तुम्हारा, हमारा हम सब का भारत|

Topic(s) of this poem: feelings


Comments about हम सब by Ajay Srivastava

  • Rajnish Manga (12/12/2015 5:16:00 AM)


    Bharteeyata ki pahchan karane wali is sundar kavita ke liye mera aabhar sweekar karen, ajay ji. kam shabdon me aapne itni badi baat kah di hai. (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
Read all 1 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Saturday, December 12, 2015



[Report Error]