जिंदगी के मोड़ Poem by Vinod Pandey

जिंदगी के मोड़

Rating: 5.0

बनी जिंदगी जंगल सा वन, शीशा-ए-दिल टूट चुका;
रही ना हिम्मत खुद से लड़ने, की अंतर्मन टूट चुका |
हुई परायी अपनी ख़ुशी जब, ग़मों से नाता जोड़ लिया;
हुए पराये अपने ही जब, रिश्तों ने मुख मोड़ लिया |
गिरे मूल्य रिश्तों के फिर से, अन्दर से मै टूट चुका;
बनी जिंदगी जंगल सा वन, शीशा-ए-दिल टूट चुका;
रही ना हिम्मत खुद से लड़ने, की अंतर्मन टूट चुका |
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Wednesday, March 16, 2016
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 17 March 2016

अंतर्मन के घात-प्रतिघात तथा भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति. धन्यवाद. एक उद्धरण: हुई परायी अपनी ख़ुशी जब, ग़मों से नाता जोड़ लिया; हुए पराये अपने ही जब, रिश्तों ने मुख मोड़ लिया |

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Vinod Pandey 17 March 2016

साभार धन्यवाद रजनीश भाई जी

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