गर मैं कहूं कुछ... Poem by Vinod Pandey

गर मैं कहूं कुछ...

गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?
महफ़िल भरी फितरतों से था वाकिफ; यकीं कर नहीं फ़िक्र करता कभी था,
मिली आज मंजिल कहे कोई कुछ भी, मुझे याद है जिक्र करता तब भी था |
बनी जिंदगानी, ये ऐसी कहानी, जता दो मुझे क्या कभी सुन सकोगे?
गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?

मुझे याद हैं आज भी मेरे वादे, तुम्हारे कहाँ है तुम्ही को पता है;
निभाना था मुझको मेरी जिम्मेदारी, इरादे तुम्हारे तुम्ही को पता है
बोलियां भी भजन सी लगे दोस्तों की, गर सुन सकें हम अंतःकरण से
मगर देखकर जब कसे तंज दुनिया, कहे इन परिन्दों में कोई खता है |
बनी जिंदगानी, ये ऐसी कहानी, जता दो मुझे क्या कभी सुन सकोगे?
गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?

बिगड़ जाये नीयत कदम डगमगाए, भरोसा बना एकदम टूट जाये;
मुनासिब न हो पाए फिर वो भरोसा, सही हो कि वो आश फिर छूट जाये |
दस्तूर कुदरत का अब तक यही है, समय से बड़ा शख्स होता नहीं है;
जिसने भी अब तक निभाया इसे है, यकीं कर वो नाकाम होता नहीं है |
बनी जिंदगानी, ये ऐसी कहानी, जता दो मुझे क्या कभी सुन सकोगे?
गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?
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गर मैं कहूं कुछ...
Wednesday, March 16, 2016
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